बारिश

ये कमबख्त बारिश, रुकती ही नहीं

कैसे बरस रही है देखो हफ़्तो से

नजाने है क्या जो पिघलता ही जा रहा

मेरे दिल सा कोई दिल वहाँ ऊपर भी टूटा है क्या..!

-भानुप्रिया

Advertisements

इश्क़

ये इश्क़ ना, बिल्कुल मरीचिका सा है

देखने मे तो छिछला समंदर लगा

फिर नजाने दिल कैसे इसमे डूब गया..??

कैसे जायज़ हो उसके धोखे पर ऐतराज़ मेरा.,
उसकी रुसवाई ने मेरे लफ़्ज़ों को हुनर बख़्शा है…

तुझे ख़बर भी है ??

तुमसे मिलने के ख़याल में

रंज-ए-जुदाई के मलाल में..

मेने खुद से दूरी कितनी बढ़ा ली,

तुझे खबर भी है??

 

उस रोज़ जो तुम चले गए थे

बिना मेरे सवालों को आइना दिए..

मैं, तुमसे मिलने की जद्दोजहद में खुद से फिर मिल ही नहीं पाई कभी

तुझे ख़बर भी है?

 

वो जो तुम दरकिनार किये बैठे हो न आज मीलो दूर,

हाँ वो जरा सा चुटकी भर प्यार..

बिसराने में उसको, सारी उम्र लगी मुझको,

तुझे खबर भी है?

 

मुझमें लड़ते मेरे दो खेमे है,

एक तुझे प्यारा एक को तू प्यारा..

मेरी खुद की खुद से सुलह हो ही नहीं पाई कभी

तुझे खबर भी है?

-भानुप्रिया

वो बचपन की मोहब्बत

ये पल कितना खाली लग रहा है। दिल मायूसी में बैठ सा गया है। आँखें तुमको जाते देख तो रही है पर होंठ कुछ कह नहीं पा रहे। और मन…ये मन बस ख़यालों की उधेड़बुन में खोया हुआ है।। हज़ारो सवाल उठ रहे हैं जेहन में कि कैसे तुमने एक पल में कह दिया के मुझको तुमसे कभी मोहब्बत नहीं थी? कैसे तुम चले गए आज बिना मुड़ के एक दफा भी देखे? क्या जरा भी मुश्किल नहीं रहा होगा ये तुम्हारे लिए? थोड़ी कशमकश में तो जरूर रहे होंगे तुम भी..मैं जानती हूँ। कितने बरसो का संबंध बस यूं ही पल भर में बिखर गया। औऱ तक़लीफ़ की बात ये है कि इतने में भी तुम जान नहीं पाए के तुम मेरे लिए क्या थे? आखिर क्यों.. और कैसे? क्या तुम्हें नहीं पता था कि मेरी सारी रचनाएं बस तुम पर ही होती थी। और तुम कोई किरदार मात्र नहीं थे, मेरी कविताओ के विषय हुआ करते थे। मेरे जीवन के सारे भागों के हासिल ओर शेष.. सब तुम ही थे। और तुम्हे फिर भी लगा मुझे मोहब्बत नहीं थी।जबकि मेरे लिए तो दोस्ती, प्यार, साथी सबका अर्थ बस एक तुम्हारा ही नाम था। मेरे लिए तो ईश्वर से मांगी हुई मेरी सारी दुआओं के सबब में तुम मिले थे मुझे। तुम्हे नजाने क्यों लगा के मुझे मोहब्बत नहीं थी।

पता है! वो जो चॉकलेट ओर तोहफे बचपन में मैं लाती थी न कभी कभार तुम्हारे लिए, वो उन पैसों के होते थे जो त्योहारों पे दादी, बुआ या कोई रिश्तेदार मुझे दे जाते थे। और तो और हर दीवाली की छुट्टीयों में तुम्हारी नोटबुक जान बूझ कर मैं अपने पास रख लेती थी ताकि तुम्हारा होमवर्क कर सकूं। बचपन के सारे my best friend के essay मेने तुम्हारे ही नाम पर लिखे हैं।

उफ्फ! ये सब कुछ भी तो तुमको काफी नहीं था समझाने को। मगर ये बताओ? किताबों के हर दूसरे पन्ने पर लिखा तुम्हारा नाम और उसके घेरे में लाल स्याही से बना छोटा सा दिल..ये सब भी क्या काफ़ी नहीं थे? अब और कितने सबूत दूं कि मुझको भी मोहब्बत थी..।।

-भानुप्रिया

कहो कुछ तो!!

कहो कुछ तो तुम

या कुछ मुझको ही कहने दो

यूँ क्यों दबा लें लफ़्ज़ों को हम सभी

शराफत का ये इश्तिहार अभी रहने दो..।

था राम वहाँ या रहता था अल्लाह

इस मुद्दे पर बहस हम थोड़ा रुक के करेंगे

गर उजाड़ जाए किसी मासूम का घर इससे

तो रोको उसे, यूँ तलाक़ तलाक़ तलाक़ न कहने दो..।

कोशिश करो थोड़ा तुम भी, मैं भी

क़तरों में ही सही..होगा पूरा घर रोशन

जरा वक्त लगेगा बदलने में हालात

हौसलों को अपने तैयार तुम रहने दो..।

बस एक शुरुआत करो तुम, बस कुछ कहो

या फिर यूँ करो, कुछ मुझको ही कहने दो..।।

-भानुप्रिया

रिक्त कविता

तेरे मेरे किस्से में

बस इतना ही था हिस्से में

एक रात वो जब सब छूटा था

संबंध हमारा टूटा था

फिर तुम बस उसी के हो गए

फिर मैं भी बस उन्ही की हो गई

वापस मिलने का वादा न था

मुड़के लौटने का इरादा न था..।

अब कितने साल बरस है बीते

उम्र कटी सालों तक जीते

सब कुछ साझा है मेरा उनसे

उसका भी हक़ है पूरा तुम पे

हमारा बचा जितना भी है इसमें

हो सके तो उसको भूला जाना

वो जो एक रात रखी थी अनछुई

लौटो अब तक उसे जला जाना..।।

-भानुप्रिया