वो लड़की

अपने शहर के फेरे में फितरतन मैं उसकी गली से जरूर गुजरता हूँ। अक्सर झरोखें में बसंती मुस्कान लिए दिखती थी वो। कभी फोन पे बतियाते तो कभी पड़ोसी सहेलियों से हँसी ठिठोलियाँ करती। नाम तो मैं नहीं जानता पर खूबसूरत इतनी के क्या कहूं,,! खिड़की पर खड़े हवा के झोंके के साथ, उसकी जुल्फें जो मगरूरियत से उड़ती ओर जो पासबनी में उंगलिया आगे आती, नज़ारा अप्रतिम होता था। और उसकी नज़र, उसकी एक नज़र तो किसी बर्फ़दार बारिश से कम न थी। नए खिले फूलों सी ताज़ा वो मुझे सर्द रात सी लगती थी, शांत और शोख। और नतीजतन मेरे लिए किसी हूर से कम नहीं थी वो।

उससे मेरा कोई संबंध नहीं था। या यूं कहूँ की जान पहचान तक नहीं थी। और एक तरफा प्यार तो बेशक़ मैं नहीं कहूंगा। पर हाँ.. हर छुट्टी में घर के दौरे पर उसकी गली से गुजरना और उसे नजर भर देखना जरूरी हुआ करता था।

लेकिन इस दफा देखा तो खिड़की पर कोई नहीं था। दरवाज़े पर भी ताला नज़र आया। मन बेचैन था। …आखिरी बार पिछले जाड़े में देखा था उसे, चेहरे का रंग उड़ा सा था और बदन बेजान लगा। न फोन पर बात कर रही थी न सहेलियों से मज़ाक। चेहरे पर हँसी तो दूर। आँखे लाल थी। कईं दिनों तक रोइ थी वो शायद। या सोइ नहीं होगी। पथराई आँखों से बस एकटक रास्ता देख रही थी। शायद किसी का इंतजार था उसे।

…पर अब वो यहाँ नहीं रहती। सुना है! पिछले महीने खुदखुशी कर ली। प्यार में किसी ने धोखा दिया। कोई झूठ फिर एक जान लील गया।

अगली दफ़ा स्टेशन से घर जल्दी पहुंच जाऊंगा शायद। इस गली का फेरा तो अब ख़त्म हुआ…।।

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गुज़ारिश

पिछले हफ्ते नवरात्रा पर घर से बुलावा आया। मां बिमार थी। फोन रखते लगा मानो वज़न बढ़ सा गया हो सीने पर। एक उदासी सी महसूस हुई, या शायद बेचैनी। तुम्हारे बाद घर जाने से मन कतराता है। पर जाना जरूरी था, तो मैं आ गई। स्टेशन से घर का रास्ता भी किसी लंबे सफर से कम नहीं।

देखने को तो शहर में अब भी कुछ नही बदला है। शोर उतना ही है गाड़ियों का। वो ccd जहां हम मिला करते थे अब भी वहीं है। कुछ चेहरे बदल गए है लेकिन।

ये रास्ते भी तुम्हारी यादों से सराबोर है सारे; बहरहाल कुछ लंबे लग रहे है। वही दुकानें, कुछ बदली तो है पर खास नहीं।

तुम्हारे घर की तरफ जाती वो सड़क कितनी दूभर लग रही है अब। उफ्फ!! मन बोझिल हो रहा है। कितने बरस बीत गए है, पर लगता है मानो कल ही कि बात हो। और ये रास्ता न जाने और कितना लम्बा है। सड़के बस चलती है अब, कहीं पहुँचती नहीं। इतने शोर में भी भीतर सन्नाटा है अनायास। और तो और शहर की हवाओ में तुम्हारी महक भी नहीं।

यहाँ से आगे जाकर एक गली पड़ती है दायीं ओर। वहीं, जहाँ मैं तुम्हारा इंतजार करती थी हर रोज़। उसी दरख्त के नीचे मन कहीं अटक सा गया है। मैं और वक्त, वहीं रुक गए है दोनों। इस दफ़ा तुम गुज़रो वहाँ से…तो मुझको भी लेते आना…।।

-भानुप्रिया

इश्क़

न भूख प्यास की ख़बर

न बातचीत का मन

बदन सुस्त और आंखे अलसाई सी रहती है

ये इश्क़ भी कितना बुढ़ापे जैसा है..।

-भानुप्रिया

माँ

मैं अक्सर झरोखे से देखती हूं

उस सूखे पेड़ की हरी टहनी को

कुछ ही पत्तें शेष बचे है

बदन पर उसके

कभी हरे थे

अब मटमैले, पीले से है सारे

बढ़ती उम्र की झुर्रियां साफ नजर आती है

हर एक पत्ता, मानो उम्र हो पेड़ की

अब शायद!

कुछ ही माह साल शेष होंगे

उसकी हर डाली को मैने सूखते देखा है

मानो किसी अपने के विरह का गम हो उसे

कईं फलों को बाज़ारों में बिकते भी देखा

बेटे होंगे शायद इसके

शहर कमाने जाते होंगे..

कभी कभी कुछ शैतान बच्चे

पत्थर मार भाग भी जाते है

और पेड़

नाराजगी में बस पत्ते फड़फड़ा देता है

जैसे मोहल्ले की कोई बूढ़ी अम्मा

होंठ हिला बकती हो गालियां..

बाकी वक़्त पेड़ सख्ती से

पथराया सा रहता है

मानो टकटकी लगाए कोई मां

बेटों के इंतजार में बैठी हो..

ये माएं भी न,

उफ्फ!!

न जाने किस मिट्टी की बनी होती है..।

-भानुप्रिया

एक रात का किस्सा

कल रात

बड़ी खामोशी थी आसमां में

टिमटिमाते तारों की चमक भी

कुछ कम सी लगी

कोई अपना उनका, या खास कोई

साथ छोड़ गया था शायद

सुना है! कोई तारा टूटा था

मैं भी छत पर लेटी

टकटकी लगाए

बस देख रही थी कुछ

सन्नाटा गूंज रहा था जेहन में मेरे

आंखे बोझिल थी,

और दिल उदास..

नींद खुली जब

तो सितारों की बैठक खत्म हो चुकी थी

सुबह चमक रही थी

आंखों में,

सिर्फ ओंस की बूंदे थी पत्तों पर

हर तरफ बिखरी हुई

वो चांद किसी अपने के ग़म में

जरूर रात भर रोया होगा..।

एक रोज़

और फिर एक रोज़ यूं हुआ,

के लड़खड़ाने के डर से

नाचने की ख्वाहिश हार न जाए;

और उसने बैसाखी तोड़ दी…।

                     और फिर एक रोज़ यूं हुआ,

                     के भीतर के तूफानों के डर से

                     वो कहीं टूट कर बिखर न जाये;

                     और उसने क़लम उठा ली…।

और फिर एक रोज़ यूं हुआ, के

बेड़ियों की जकड़न कहीं

कल की उड़ानों को न बांध लें,

और उसने पर खोलना सीख लिया…।

                     और फिर एक रोज़ यूं हुआ, के

                     रात तकिए से गुजरे दरिया का सच

                     उभरी आँखें न बयां कर दे

                     उसने काजल से दोस्ती कर ली..।

           भानुप्रिया

फ़र्क़

वो चाँद जिसकी तारीफों के पुल बांधे थे

न जाने कितनी आदतें बिगाड़ी थी उसकी

सुना है! अब उदास सा रहता है

तुम्हारे जाने के बाद..।

– भानुप्रिया